बुधवार, 16 अप्रैल 2014

बेशक नरेंद्र मोदी ही मौजूदा लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक चर्चित नेता है। उसकी वजह है कि वे सबसे सशक्त राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी है। साथ ही उन्हें देश के अधिकांश उद्योग घरानों और मीडिया संस्थानों का अघोषित सहयोग है। श्री मोदी की खूबी यह है कि उन्होंने अथक मेहनत , कुशल प्रबंधन और मजमाई भाषण शैली के जरिये नेतृत्व के संक्रमण के दौर में भीड़ जोड़ने वाले नेता की छवि बना ली है। जो उनके करिश्माई व्यक्तित्व होने का भ्रम पैदा करती है। पर सच्चाई भाजपा के वरिष्ठ और विद्वान नेता डॉ मुरली मनोहर जोशी के वयान में निहित है कि " लहर भाजपा की है ,मोदी की नहीं। "
  मै श्री जोशी  के कथन से आधा इत्तिफ़ाक़ रखता हूँ। दरअसल लहर मौजूदा केंद्र सरकार और कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ है। जिसका सीधा फ़ायदा मजबूत और बड़ी पार्टी होने के कारण भाजपा को मिल रहा है। संगठन की सुद्रणता में संघ और भाजपा का कोई शानी नहीं है। अराजनीतिक और वृद्ध प्रधानमंत्री तथा अनुभवहीन और बेअसर राहुल गांधी के कारण मोदी की पौबारह है। मोदी को खुला मैदान मिला है ,मन माफिक दौड़ रहे है। वह सच्चा झूठा जो बोले सुना जाता है। उनको किसी भी स्तर पर रोकने की कोशिश कांग्रेस नहीं कर पा रही है। राहुल अपने भाषण या कार्यशैली से सही बात भी जनता के दिल में नहीं उतार पाते। मैदानी स्तर पर मोदी को जो भी चुनौती है वह कांग्रेस से इतर क्षेत्रीय दलों से है। 
   भाजपा का बढ़ता ग्राफ और मोदी का कद भाजपा के भीतर और बाहर एक डर का कारण जरूर बन गया है। यदि मोदी प्रधान मंत्री बनते है तो क्या होगा ?यह प्रश्न सबके का मानस में कौंध  रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी की तरह सहज स्वीकार व्यक्तित्व मोदी नहीं है। पार्टी ,जनता तो दूर विरोधी दल के नेता भी वाजपेयी के राज तिलक से खुश थे। यह बात मोदी के साथ नहीं है। मोदी का ज्ञान ,उनकी शैली और विरोधियों को किसी भी हद तक ठिकाने लगा देने वाला असहिष्णु स्वभाव;बौद्विक समाज और राजनीतिकों को परेशानी का सबब है। प्रधानमंत्री को देश के साथ ही दुनिया से मुखातिब होना पड़ता है। उसका कहा एक शब्द भी देश की आवाज होती है। मोदी में वाजपेयी जी जैसी सहिष्णुता, सबको साथ लेकर चलने की कला ,प्रशासनिक विवेक और कौशल दिखाई नहीं देता। कभी संसद में वाजपेयी जी ने कहा था और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उसे दुहराया था "बोलने के लिए वाणी होनी चाहिए ,लेकिन चुप रहने के लिए वाणी और विवेक दोनों चाहिए। "देश का भविष्य अब नियति ही तय करेगी। 
 -नरेंद्र दुबे